milap singh

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Tuesday, 15 January 2019

धुँध

यह धुँध घोर छछुंदर है
सूरज को रोकने उठती है
फैल के कुछ पल चारों ओर
जोर - जोर से हँसती है।

रोक लिया सूरज को मैंने
देखो सारे जग वालो
आज से मेरा है धरती - अंबर
उजाले की स्मृति मिटा डालो।

लेकिन सच कब मिटता है
झूठ का पर्दा उठ जाता है
तोड़ कुहासे का फाहा - फाहा
सूरज फिर से निकल आता है।

....... मिलाप सिंह भरमौरी

शुभ प्रभात दोस्तों.....

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