milap singh

milap singh

Monday, 25 June 2018

Karj mafi

कर्ज माफ़ी
*************

टीस उठती जरूर सीने में
मगर दर्द इतना भी ज्यादा न होता।

लड लेता परेशानियों से अपनी
खुदकुशी का इरादा न होता।

मेहनती किसान था बहुत वह
शायद अब तक भर भी देता कर्ज सारा ।

अगर कर्ज माफी का कमबख्त झूठा
यह जानलेवा वादा न होता।

      ------- मिलाप सिंह भरमौरी

Thursday, 14 June 2018

ब्रह्माराक्षस

यह कौन गिरा रहा है

स्कूल की दिवारों को

झाड़ियां उग आई हैं मैदान में

फटी किताबें बिखरी हैं 

चारो तरफ

यह कौन हिला रहा है पेड़ों को।

यह क्या 

यह सूरज कहां चला गया

क्या इसे अंधेरा निगल गया

रुह कांप गई मेरी 

देख कर यह दृष्य

जीभ रुक गई आवाज दव गई

फिर भी कोशिश की

कौन? कौन है वहां...

किसी अतृप्त आत्मा की अभिव्यक्ति पाई

रौंगटे खड़े कर देने वाली आवाज आई

ब्रह्माराक्षस.......

ब्रह्माराक्षस हूं मैं

अब हर गली मौहल्ले में

ब्रह्माराक्षस पैदा होंगे

हर पेड़ पर ब्रह्माराक्षस दिखाई देंगे।।

सुना नाम जब राक्षस का

मति मेरी भरमा गई 
स्थिर सी सांसें हो गई
पैरों में जडता आ गई

कोशिश की भाग जाऊं मैं
गर सोया हूँ जाग जाऊं मैं
अपने हाथ पैर हिला कर देखे
खुद को चांटे लगा कर देखे
पर सब कुछ सच सा लगता था
पल पल सांप सा डंसता था

सफेद साय सा खड़ा अंधेरे में
दूर ब्रह्म राक्षस हंसने लगा 
मुझे चबा जाने की मुद्रा में
खूंखार दांत अपने पीसने लगा

बाज के जैसा अपना पंजा 
मेरी ओर वह करने लगा
देखते ही देखते हाथ उसका
लम्बाई में बढ़ने लगा

अंधेरे के सन्नाटे में
उसकी हंसी बिजली सी चमकती थी
अंत समय की घड़ी मुझे अब
अपनी बहुत नजदीक लगती थी.......

जैसे- जैसे उसका पँजा
मेरी ओर बढ़ने लगा
जीभ सूख गई रेगिस्तान सी
मैं ज्यादा से ओर ज्यादा डरने लगा

फिर स्मरण शक्ति पर बल दिया
शायद कोई निकल आये हल नया
भूत भगाने का कोई मन्त्र -शन्त्र 
शायद किसी कक्षा में हो याद किया

घोड़े सी अपनी बुद्धि दौडाई
पहली से आजतक जो की थी पढ़ाई
संस्कृत में शायद हो कोई उपचार
संस्कृत की कक्षाओं पर दृष्टि जमाई

आधे अधूरे संस्कृत के श्लोक
में हकलाती जुबान में बड़बड़ाने लगा
मेरे अधूरे ज्ञान को देख कर
ब्रह्म राक्षस ओर भी मुस्कराने लगा

यह अधूरे मन्त्र न आएंगे काम
होकर रहेगा आज तेरा काम तमाम
नहीं बचेगा आज तू मूर्ख
मेरे पंजे लेकर रहेगें तेरी जान.......


मेरे इस व्यवहार से
मन थोड़ा सा उसका विचलित हुआ
अपना ख़ूनी हाथ उसने
मोड़ के अचानक पीछे किया

एक नजर डाली मुझ पर
दूसरी स्कूल की लाइब्रेरी की ओर गई
गया वह ब्राह्म राक्षस उस ओर
हाथों और लातों से दीवारों पर प्रहार किए कई

तोड़ डाली सभी दीवारें
छत उखाड़ फेंकी तिनकों सी
उलट पुलट दी किताबों की अलमारियां
देर लगाई न उसने मिनटों की
 
काँच का टूटना टिनो का टन -टन
मन में जोर से टकराता था
ज्ञान का करता वह राक्षस सत्यनाश
और जोर- जोर से खूंखार हँसता था

जगह -जगह बिखरी थीं  ईंटे
टूटे दरवाजे पड़े थे मलवे के ढेर पर
खिड़कियां हुई थी टुकड़े -टुकड़े
मन कुंठित होता था दृश्य देखकर.......


विभिषत दृश्य देख के यह
हृदय में
प्रस्फुटित हुए रुदन स्वर
जब सुनी
आवाज मेरे रोने की उसने
फिर ब्रह्माराक्षस ने देखा ईधर।

तप्त रक्त छोड़ती आँखे
आग की ज्वाला सी
चमक रही थी
मुँह पर चिपकी सूखे खून की पपडी
वक्ष स्थल तक 
लटक रही थी।

वह बढ़ा मेरी ओर
हुआ ओर भी क्रूर
हर कदम पर उसके
सूखी पत्तियां और धूल उड़ने लगी
सांप के फन सी लार टपकाती
जीभ विषैली
मुंह से बाहर निकलने लगी ।

लम्बे -लम्बे अग्र दाँत उसके
चार
होंठो से बाहर निकल रहे थे
मुझे चवा जाने को जिंदा
भूख से जैसे मचल रहे थे।

कड- कड की आवाज कठोर
दाँतो के टकराने से हो रही थी
मेरी हड्डियां चूसने की अनुभूति
रसना उसकी कर रही थी।.........


मेरे और उसके बीच
अब बस कुछ कदमों की दूरी थी
अब तक तो कुछ कर न सका था
हर ख्वाहिश अभी अधूरी थी।

पास अंत समय को आता देख
भिखारी वाला बन चुका था भेष
मैं हाथ जोड़ता विनती करता
रहा था उसके आगे माथा टेक।

जब पशुता सिर पर चढ़ जाती है
अच्छाई डर कर छुप जाती है
फिर राक्षस से क्या उम्मीद करें
जब इंसान की मति भी मर जाती है।

मेरे रोने का न कोई फर्क पड़ा
ब्रह्मा राक्षस ओर आगे बढ़ा
तत्क्षण मुझे मारने के लिए
अपना हाथ हवा में उसने किया खड़ा

फिर वापिस कर के हाथ को उसने
जोर से मुझको थप्पड़ मारा
शायद अभी हाथ गाल को छू न पाया था
मैं पहले ही मुर्शित होकर निचे गिरा.......


न हृदय में धक- धक
न नाडियों में स्पंदन
भूमि पर गिरा हाथ फैलाए
कर रहा जैसे चिर अलिंगन
जैसे मिला हो कोई वर्षों बाद उससे
जिसे चाहता हो मन
देख रहे थे टिमटिमाते हुए तारे
और झांक रहा था गगन।

निस्तब्धता भी अच्छी लग रही थी
उस भयानक डर के बाद
मन करना ही नही चाहता था
बीते खूंखार पलों को याद
ब्रह्मा राक्षस का ख़ौफ 
भूल जाना चाहती थी आँखे
रहना चाहती थीं सदा ही बंद
नासिका ने खोल दिए थे सारे कपाट
पहचानना ही नहीं चाहती थी
अब कोई भी गन्ध।

रेशम का स्पर्श
और सुई की चुभन
भूल चुकी थी त्वचा
शांत मुख सुख अनुभूति कर रहा था
पथरीली मिट्टी पर पड़ा
खाली हो चुका था बर्तन मिट्टी का
टूट चुका था सांसों का घड़ा
निःशब्द मौन हर ओर सुनाई देता था......

फिर भी
जहन चल रहा था सारा
और हो रहीं थीं तरकीबें
कैसे कम हो मुसीबतें
जानबूझकर मृत सा 
घोषित कर रहा कर रहा था खुद को
रोक रखी थी साँसे
हिलने नहीं दे रहा था बालों को भी
कि यकीन हो जाए उसको।

फिर अचानक उत्साह सा
भर आया मन में
कितना डरपोक है तू देख
यह सब तो था सपने में
सपने में होने का दिलासा
खुद को देने लगा
फिर से अतिउत्साही होने का
खुद को सबूत देने लगा।

यह सब तो बहुत पहले
शायद सपने में हुआ था
अब तो दृश्य भी भूलने लगे थे
स्मृति पटल पर छाया था धुआँ सा
पर अभी भी नहीं हिला रहा था
किसी भी अंग को
बस दिमाग भाँप रहा था
चेतन और अवचेतन को।........

फिर कोशिश की
खुद को परखने की
टटोलने की कि हूँ कहां
यहाँ क्या कर रहा हूँ
निर्जन में 
किस प्रयोजन से आया था यहाँ।

बन्द पड़ी आँखे खोलने की
पूरी कोशिश की
अंगुष्ठ और तर्जनी से
पलकों को उठाकर देखा
पर बस अंधकार
घोर कालिमा दिखाई दे रही थी
पता नही बाहर थी
या मेरे अंदर से निकल रही थी
हर ओर 
चारों दिशाओं में
बस अंधकार
फिर भी सबको स्वीकार

फिर नसिका सुकैड कर
नथुने उपर कर के सूंघना चाहा
शायद पता चले
है यह स्थान कहां
लेकिन एक अजीब दुर्गंध 
जो पहले कभी महसूस नहीं की थी
आने लगी......


दुर्गंध इतनी कि
सहन न होती थी
स्वतः ही हाथ नाक पर आ जाता था
पर सांस रोकना भी दुष्कर था
एक हद से ज्यादा
जरा सा हाथ उठाया नाक से तो
फूटने लगता था माथा ।

अजीब उलझन थी
अजीब मंजर बन गया था
सांस लेना भी जैसे 
तीखा सा ख़ंजर बन गया था
जो चीर जाता था
नाक से लेकर फेफड़ों तक की नली
लेकिन अंधेरा था चारों ओर
दिखाई नहीं देती थी
कोई राहत की गली।

दुर्गंध इतनी विषैली थी कि
इसे न रोक पाता था सफेद कपडा
अब दुर्गंध से हो रहा था
प्रत्यक्ष आंदोलित सांसों का झगड़ा
हाथ से नाक दबाए 
चीख निकली
इतनी भयंकर दुर्गन्ध 
कहां से आ रही है?
यह तो रक्त में समा रही है
यह दुर्गंध मुझे मार डालेगी
फेफड़ों को सीने से उखाड़ फेंकेगी.....


यह दुर्गंध साधारण नही है
भयंकरता इसकी अकारण नही है
यह ईमान के सड़ने की दुर्गंध है
साथ ही ज्ञान के सड़ने की भी
कोई इलाज नही है इसका
जिसने भी सूंघा है इसको
अंत हुआ है उसका।

कोई नहीं बचेगा
हाइड्रोजन बम से भी घातक है ये
धीरे- धीरे सब ओर फैलेगी
परमाणु श्रृंखला जैसी
नाभकीय संलयन और बिखण्डन की तरह
ये दुर्गंध स्वच्छ हवा का स्थान ले लेगी।

नहीं बचेगा 
अब तू बच ही नहीं सकता
तुमने इस दुर्गंध को सूंघ लिया है
इसका तो एक परमाणु भी घातक है
तुमने तो कितना ही द्रव्य पिया है।

फेंक दे अब इस 
सफेद कपड़े को
जिससे चेहरा छुपा रखा है
अब तेरा चेहरा उजागर हो जायेगा
सब के सामने
पौ फटने से पहले ही
तू धराशायी धड़ाम गिर जायेगा
अब नहीं काम करेगा यह
सफेद नकाब।.....


किसकी आवाज है यह?
कौन बोल रहा है?
चारों दिशाओं में
यह किसका स्वर गूंज रहा है
कौन दे रहा है उत्तर मेरे प्रश्नों का
दिखाई तो कोई नहीं देता
केबल स्वर ही गूँज रहे हैं
रहस्य की बन रहीं
आकृतियां अँधरे में लगातार
तिलिस्म के जैसे हजारों दरवाज़े खोल
रहे हैं।

फिर याद आई वो
दुर्गन्ध की बात अचानक
जो कितनी ही
अनजाने में सूंघ ली थी मैंने
उस सघन अँधेरे में शरीर का
निरीक्षण करने लगा अपने।

लेकिन कुछ भी न दिखाई देता था
रोशनी न होने के कारण
जेब में हाथ डालना चाहा
टटोलने के लिए
देखना चाहा
लाइटर को जलाकर
लेकिन हाथ न चल रहा था
जैसे भारी किसी वजन के नीचे दब गया था
या किसी ने बांध दिया था रस्सी से
या पकड़ रखा था किसी दुर्दांत ने।.....

हिला ही नहीं पा रहा था हाथ
जैसे हो ही नहीं कन्धे के साथ
तटस्थता हरकत की विचित्र लग रही थी
बस दिमाग चल रहा था
और सब सुन्न था
शून्य

सोये हुए व्यक्ति को जैसे
दवा लिया हो अद्रश्य दबाव ने
छटपटा रहा हो बिस्तर पर जैसे नींद में
पर बड़बड़ा नहीं पा रहा हो
नींद में भी
जुबान चुप तटस्थ 
नियति अंधेरे की नजर देख रही

उस सूंघी हुई दुर्गन्ध का है
शायद यह असर
जो हिला ही नही पा रहा हूँ
अपने हाथ पैर और बूढ़ी कमर
जुबान को चिपका लिया हो
या खींच लिया हो
चुम्बक ने लोहे के टुकड़े की तरह
अब छूटने नहीं दे रहा हो
और पकड़ ऐसी कि
मुकाम तक पहुंचने नहीं दे रहा हो

यह क्या अब तो 
जुबान के होने का एहसास भी
खत्म हो गया है
कब से यह वाचाल गूँगा हो गया है
कब से पता नहीं
शायद दुर्गन्ध सूंघने के बाद।.........


हो गई हैं सब इंद्रियां
बिजली के स्विच की तरह
ऑन किया तो संचारित होता है प्रवाह
महसूस करने का
ऑफ किया तो हो जाता है सब जड़
सिर्फ मन घूमता रहता है
ढूंढता रहता है चेतन अवचेतन की हद
और यही हाल है
हृदय में उमड़ रहे आदर्शों का
परिभाषा भी गढ़ते हैं अनुकूल
जब चाहा कह दिया मिट्टी और गर्द
जब चाहा कह दिया गौ धूल
पहले त्वचा का पहना था चोला
पर अब
स्वार्थता हड्डियों में समा चुकी है
जरा सी सुविधा देखते ही
टपक जाती है लार
खड़ा हो जाता है सोया हुआ स्वार्थ
मीठा लगने लगता है खार

जोर से बिजली चमकती है
पर आवाज नहीं आती है
क्षणिक प्रकाश में आंखे
जड़ अपने शरीर को देख पाती हैं
यह क्या सफ़ेद शरीर
नीला- सा पड़ चुका है
और पहले से फूल भी गया है।.......


बिजली चमक कर लुप्त हो जाती है
अंधेरे में क्षण भर में
पर कारण खोजने की कितनी ही
छोड़ जाती है चिंताएं मेरे मन में

सोच में डूब जाता हूँ मैं
पाँव से लेकर सिर शिखा तक
तथ्य के अंजाम तक पहुंचने का
प्रयत्न करता हूँ मैं भरसक

ढूंडता हूँ कारण उभर आई
विद्रूपताओं का सुंदर अंगों में
भूल कहां हुई थी जीवन में
कमी तस्वीर में थी या रंगों में

सच झूठ की जाली से छनकर
आत्मचिंतन का सत्य बनकर
वाक्य छनकर निकली बूँद के जैसा
कहता है मेरे सामने तनकर

यह उसी दुर्गन्ध का असर है
जिसे सूंघा था तूने
जाने में अनजाने में
स्पष्ट रूप में या बहाने से
मजबूरी से या लालच से
दुर्बल पर आजमाई ताकत से
यह दुर्गन्ध पीछा नहीं छोड़ेगी
पीछा करेगी लागतार।.......

जिंदगी के अंधेरे में
मैं व्यथित चिंता में लीन था
चल रही थी अब तेज हवाएं
लेकिन अब भी सुन शरीर था

समय की करवट को भांप रहा था
होकर बेसुध काल जैसे नाच रहा था
कुचल रहा पैरों से सूखे पत्तों को
हरी टहनियों को हाथों से नोच रहा था

चमक रही थी बिजली घनघोर
झंझा की फुफकारों में
कह रही थी प्रकृति जैसे कोई बात 
अपनी मानो इशारों ही इशारों में

स्थान वही दिखाई दे रहा था
टूटे हुए स्कूल के इर्द गिर्द का परिवेश
कर रहा था तस्वीरें उजागर
कड़कड़ाती हुई तड़ित का आवेश

सपना नहीं है यह हकीकत ही है
मन में फिर से आभास होने लगा
देखकर इस घोर विपत्ति को
मन जोर जोर से रोने लगा

यह कारागार है ब्रह्मा राक्षस की
इस की सलाखें कैसे तोड़ पाऊंगा
क्या मार डालेगा यातना देकर मुझको
या यहीं जड़ पत्थर बन कर रह जाऊँगा......


सुन पड़े शरीर को
फिर से हिलाने की कोशिश की
जैसे ही थोडी सी 
अंगों ने मेरे हरकत की

पीड़ा की एक पराकाष्ठा 
महसूस मुझे होने लगी
इस दर्द की असहनीयता से
मति दोबारा से चकराने लगी

पर डर रहा था चीखने से
कि मेरी आवाज़ कहीं न वो सुन ले
रात्रि के अपने भोजन के लिए
कहीं मुझे ही नहीं आज वो चुन ले

आस पास जब देखा तो
चारों ओर सुनसान पड़ा था
ऐसे महसूस हुआ मुझे कि
अब ब्रह्म राक्षस चला गया था

अनुपस्थिति का उसकी 
मैंने फायदा उठाना चाहा
उठाकर जिंदगी का जोखिम
उस स्थान से मैंने भागना चाहा

जैसे ही कदम उठाया तो......


जैसे ही कदम उठाया
मन में मेरे एक सवाल आया
इस जीर्ण शीर्ण शरीर को लेकर
जा पाऊंगा मैं कहाँ

सोचने लगा आसान उपाय
जैसे तैसे जान बच जाए
बगल में उगी बड़ी बड़ी झाड़ियों में
छुप जाने को मैंने कदम उठाए

लेकिन यह विचार भी
उसी क्षण मुझे त्यागना पड़ा
झाड़ियों में छुप जाना इस तरह
मुझे कुछ असुरक्षित सा लगा

वह क्षेत्र तो उस ब्रह्मा राक्षस का
जैसे गृह निवास लगता था
चप्पे चप्पे भूमि पर
उसका छाया बसता था

सूखे पत्ते का गिरना भी
रूह को जैसे डरा जाता था
टकराता था जब सूखी घास से
उसके आने की आहट दे जाता था

आवाज़ हवा के झोंके की भी
तलवार के बार सी लगती थी
रह रह कर मुझे डराती थी
रूह में घाव अनेक करती थी।.....


सोच विचार किया गहन जब 
एक ओर विचार आया मन में
क्यों न लड़खड़ाते रेंगते
सर्प की तरह
कैसे भी पहुंचा जाए मन्दिर में
जो है गांव के बाहर
टीले पर
जहां बहती है झर झर निर्झर धारा
ठीक मन्दिर के सामने
विशाल शिला पर
गिरता है आवेग से जल
मोती से बिखरते हैं
जल कण
ऊंचाई तक जाते हैं
और गिर कर छोड़ जाते हैं
एहसास अपने होने का
कर जाते हैं पत्थर को गीला
चलता रहता है यह क्रम
दिन रात निरन्तर
तर रहती है शिला कठोर
जल से मिलकर
और निकल जाता है जल
पथरीले पथ पर
कुछ छोर आवाजें करता
छर छर छड़ाप छर करता।........

सुना था बड़ों से
उस जल में अदभुत शक्ति है
अमृत सम है उसकी हर बूँद
हर कालिख को धो
उजला करती है
तन का मैल
मन का मैल
बुरे विचार
किये हुए दुर्व्यवहार
बड़े बड़े धोखे के दाग
चाटुकारिता में गाए राग
सब कुछ धुल जाते हैं
बस खुरचना पड़ता है
कुछ देर बाद 
गीला करने के उपरांत
मन के तन को
पापों की स्वीकृति से
पहुंच अनुभूति तक नितांत

बैठ कर उस झरने के नीचे
कुछ देर
ठीक कर चुके हैं
कई असाध्य रोग
दूर दूर से आते हैं अब भी कितने ही लोग।......


पहुंच कर उस स्थल पर
उस झरने के पास
छोड़कर स्वामित्व मैं
बनकर अकिंचन दास
प्रकाश पुंज सी गिरती
उस जल की दिव्य झलरों में
जाकर बैठ जाऊंगा
उस दिव्य स्नान के बाद
शायद मेरे अंगों में
फिर से जान आ जाए
मिट जाए यह नीलापन
जहरीला सा
रंग पुराना शायद
फिर वापिस मिल जाए

मैं जरूर पहुंच जाऊंगा
उस झरने के पास
अभी करता हूँ चलने का प्रयास
अगर पैर नहीं देंगे चलने में साथ
तो हाथ फैला कर देखूंगा
परिंदे की तरह 
फड़फड़ा कर देखूंगा
शायद उग आए पंख 
मेरी भुजाओं पर
और उड़ने लगूं आसमान में
फिर कैसे पकड़ पाएगा 
वो ब्रह्म राक्षस मुझे।......


उस मन्दिर से सुरक्षित
कोई और जगह नहीं है
पहुँच पाऊँ परछाई तक भी
अंतिम प्रयास यही है
सुना है लोगों से
बहुत प्राचीन है मन्दिर यह
लाखों साल पहले भी
था खड़ा यहीं यह
कितने ही जल तांडव
कितने ही प्रलय हुए
कितनी ही बार उजड़ी धरती
कितने ही विनाश भूकंप हुए
एक ईंट तक न टूटी इसकी
एक पत्थर तक न भंग हुआ
अब तक है वैसी की वैसी आभा
हैरान हूँ कि
कौन सा इसमें रंग हुआ
ऊर्जा के कण निकलते है निरन्तर
इसकी दीवारों से
अमावस्या की रात में
पूर्णिमा सा चाँद
दिखता है जैसे आकाश में
गगन चूमती इसकी पताका
सदमार्ग का अंतिम छोर
छोड़ अधर्म का रास्ता
बुलाती है अपनी ओर ।.....


अंदर और बाहर के 
घनघोर अंधेरे में
छठी इन्द्री के माध्यम से
मन्दिर की दिशा का अनुमान लगाया
परिचित सी जगह में
हाथ फैला कर जैसे
बीच बीच बिजली चमक कर
राह दिखाती मंजिल की
हर्षित कर जाती थी
जरूर हार होगी कातिल की
पाकर मन का निर्देश
पांव ने उठना चाहा उस ओर
राह जाती थी जहां से
उस मंदिर की ओर

पर यह क्या?
सब योजनाओं पर
पानी फिर गया था
पांव तो
उस जगह से हिल ही नहीं रहा था
पैर उस जगह 
इतनी मजबूती से जम गया था
जैसे नट और बोल्ट से
कस दिया हो 
कर के पैरों में छेद
और वो बोल्ट पाताल को रहा हो भेद
जहां बैठा है नाग देवता
जिसने उठा रखा है
कहते हैं सारी धरती का भार
अपने फन पर।......


असमर्थ थे पांव हिलने में
नहीं जा सकता था कहीं
फिर उपाय सोचने लगा मैं
खड़ा वहीं
निहारने लगा उस दिशा को
जिस ओर वह मन्दिर था
घने अंधेरे में
कुछ प्रकाशमान सा
दिखाई देने लगा
हाँ वही मन्दिर है यह
मुझे लगा
घोर विपत्ति में जैसे
उम्मीद की किरण मिल गई थी
तपते हुए रेगिस्तान में
जैसे कोई कली खिल गई थी
डूबते को जैसे
तिनके का सहारा होता है
जो काम आ जाए मुसीबत में
वही प्यारा होता है
मन में सोच लिया था
बस उस ओर ही देखते रहूँगा
पहुंच चुका हूँ वहीं
यह मानता रहूँगा
विचलित नहीं होने दूंगा
ध्यान को जरा भी
सामने चाहे आ जाए
फिर मेरे कोई भी 
प्रकाश अब ओर भी
चमकने लगा था
करीब पहुंच रहा हूँ मैं
ऐसा मुझे लगने लगा।.....


क्षण भर के लिए मन कुछ
सुरक्षित अनुभूति पा रहा था
पर डर भी अब भी
धीरे -धीरे अंदर को खा रहा था
समझ नहीं आता था
कहाँ आकर फंस गया हूँ
यह किस अलंघ्य से
कीचड़ में आकर धँस गया हूँ
जहां महसूस ही नहीं
हो पा रहा अपना वजूद
कोई तो मिले तिनका ही सही
जिसे पकड़ने के लिए 
करूं कुछ तो उछल कूद

फिर अचानक रौशनी का
रूप बदलता है
रौशनी का घेरा
एक गोल आकृति में ढ़लता है
यह क्या यह तो
कोई पहचानी सी वस्तु लगती है
क्या यह सोने की तख्ती है
नहीं नहीं यह कुछ ओर है
लेकिन जो भी है
इस स्याह अंधेरे की
मात्र भोर है।

महाशून्य के परिवेश में
शायद तिनके के भेष में
यही वस्तु कोई राह दिखाएगी
इसी के सहारे यह रात गुजर जाएगी।


यह क्या यह तो एक आईना है
साफ दिखाई दे रहा है
पहचान पा रहा हूँ अंधेरे में
देखो कैसे चमक रहा है
आकर्षित कर रहा है
अपनी ओर
जैसे बांध दी हो किसी ने
कमर के साथ डोर
धीरे -धीरे सम्मोहित
होकर चलता जा रहा हूँ उसके पास
स्वर्णिम किनारे आईने के
बनाए गए हैं किसी धातु से खास।

सन्नाटे गूंज रहे हैं
चारों दिशाओं में
कौन खड़ा है लेकर
आईना हाथों में
अंधेरा इतना घना है
कि पता ही नहीं चल रहा
कैसी जगह है यह
जंगल है, रेगिस्तान है,
पर्वत है या मानव की बस्ती है यह
ऐसे में यह आईना
जैसे चाँद हो गोल
दूर अम्बर पर नही
सामने बीस बाईस गज पर
इसी धरती पर यहीं
कोशिश की ओर पास 
जाने की
लालसा ओर बढ़ी
उस रहस्य को पाने की.......

पहुंच गया मैं पास उसके
खुद पहुंचा या पहुंचाया गया
देखना चाहा खुद को उसमें
लेकिन कुछ नजर न आया
यह कैसा आईना है
इसमें तो कुछ भी नजर नहीं आता
क्या मैं ही हूँ नहीं सोच के मन चकराया

नहीं नहीं यह तो आईना है 
कुछ तो नजर आना ही चाहिए
अंधेरे में अपने हाथ चलाने चाहे
खुद को स्पर्श करने के लिए
लेकिन कुछ छू न पाया
मिला ही नहीं कुछ स्पर्श के लिए
हतप्रभ मैं सोच रहा था
क्या हाथ सुन हो गए हैं
या स्पर्श करने के मेरे ही
इन्द्रिय गुण खो गए हैं

जरूर ऐसा ही होगा
मैं तो हूँ , सोच रहा हूँ
देख रहा हूँ उस आईने को
शायद इस रहस्यमयी अंधेरे में
हो गया है कुछ मुझको
आईना तो सच है
सच ही दिखाएगा
कुछ सामने होगा
तो ही नजर आएगा
शायद इस घने अंधेरे में.........

मैं खो गया हूँ
इसलिए नजर नहीं आ रहा
इस अंधेरे ने मेरे मुख की, तन की
दीप्ति हर ली है
अब मैं नजर नहीं आऊंगा
इस सुनसान अंधेरे में खो जाऊँगा
लेकिन फिर माथा ठनका
अगर अंधेरा इतना घना है 
इतने सघन काले कणों से बना है
तो यह आईना कैसे नजर आ रहा है

क्या यह आईना
मुर्दों की हड्डियों के फास्फोरस से बना है
या रेडियम से निर्मित किया गया है
लेकिन फिर इसे चमकने के लिए
रौशनी कहाँ है
रौशनी का कोई स्रोत 
नजर नहीं आता
फिर यह रहस्य क्या है
कहीं यह वस्तु
एक विशाल जुगनू तो नहीं
या दूसरे ग्रह की तो नहीं
फिर याद आया
यह आईना पहले मन्दिर से
निकली रौशनी थी
यह भी सम्भव है
मेरे अनुमान में ही कुछ कमी थी
यह आईना ही था
और मैं इसे रौशनी समझ बैठा था......

.............

दूर से धोखा लग जाना सम्भव है
गलती के बाद सीखना अनुभव है
लेकिन फिर देखता हूँ इसमें
शायद कुछ नजर आ जाए
इस अंधकार से मुक्ति का
कोई हल निकल आये
यह क्या इसमें तो कुछ
ओर ही नजर आ रहा है
यह तो कोई चलचित्र बना रहा है
कोई फ़िल्म चल रही है इसमें
मूक बिना किसी आवाज के
इस सुनसान जगह पर
कौन छोड़ गया चला कर इस सक्रीन को
आईना नहीं है यह

यह तो एक टी. वी. लग रहा है
विद्युत की सहायता से
शायद चल रहा है
पर नहीं इस आकृति का
इस जैसा कोई टी. वी. नहीं देखा है
देखने में बिल्कुल यह आईना लग रहा है
चलो जो भी है
इसको सही से देखता हूँ
इसमें आखिर यह दिखाई
क्या दे रहा है
कोई अनजान- सा दृश्य
दिखाई दे रहा है इसमें
वाह! कितनी हरियाली है
चारों ओर
सुनाई नहीं देता कुछ भी
लेकिन बज रहे हैं ढोल......

........

बड़े- बड़े खेत
एक तरफ फसलें लहराती
एक तरफ परती- भूमि
क्षमता से अधिक दोहन जैसे
बेमौसम में मक्के की फसलें
खेतों में भरा पानी
दूर-दूर तक फैला
लग रहा था किसी बड़ी झील जैसा
नहीं यह झील नहीं है
यह पानी बारिश का भी नहीं है
धूल उड़ाती राहें
कैसे हो सकती थी
नहीं यहां कोई बारिश नहीं हुई थी

आगे जाकर
पानी की मोटर नजर आई
जो पानी उगल रही थी अपने मुंह से
लगातार
देखते ही  कृत्रिम झील का
रहस्य खुल गया इससे

शायद रातभर 
चला रखी थी किसानों ने मोटरें
इसलिए पानी ही पानी था खेतों में
कुछ आगे चलकर देखा
ट्रेक्टरों से खेतों की मचाई हो रही थी
मानसून अभी आया ही न था
धान की रोपाई हो रही थी
सब कुछ देख पा रहा था मैं
पर खुद को महसूस नहीं
कर पाता था
यह सब कैसे दिखाई दे रहा था
हाँ यह सब तो 
उस आईने में दिखाई देता था........

.........


अचानक जिंदाबाद, जिंदाबाद
मुर्दाबाद, मुर्दाबाद
गो बैक,गो बैक
के नारे कानों में गूंजे
इतना आक्रोश, इतनी वेदना
कि कलेजा लगा फटने
मन भयभीत हो गया था
अचानक इतना आक्रोश
कहाँ से फूट पड़ा था
शायद लोगों के सीने में
यह वर्षों से दवा था
भयभीत हो गया मैं
आखिर यह मसला क्या है
कहीं गोली न चल जाये
कहीं लाठीचार्ज न हो जाये
गिर न जाऊं मैं
दब न जाऊं मैं
तीतर- बितर होती भीड़ में
ध्यान से देखने लगा मैं सामने
लेकिन कुछ दिखाई न दिया
आईने में तो चल रहा था
वही परिवेश जो पहले देखा था
शायद इस आईने के 
कनेक्शन में कुछ गड़बड़ आ गई थी
उसकी स्क्रीन पर कुछ विचलित
तरंगे दिखाई दे रही थी
शायद हिल गई थी तार
हवा के तेज झोंके से
पर मुझे तो कुछ भी
ऐसा महसूस नहीं हुआ था मौके पे......


............

या मैं ही महसूस नहीं
कर पा रहा था हवा को
किस तरफ बह रही है
समझ ही नहीं पा रहा था रुख को
चलो जो भी था
सब बेबस था
कुछ बदलाव सम्भव न था
एक इंच हिल पाना भी
असम्भव था

फिर सोचने लगा
उन नारों के बारे में
उस उफनते आक्रोश के बारे में
सुनाई तो दिया था जरूर
पर दिखाई नहीं दिया सामने
सामने तो कुछ ओर ही चल रहा था
वातावरण सब खुश माहौल लग रहा था
फिर वो आवाजें किसकी थी
शायद दवी हुई थीं
जो चींख तो रही थीं
पर सामने सुनने वाला कोई न था
नहीं-नहीं कोई तो था
पर नहीं सुनने का ढोंग करता था
पलट कर बात कोई ओर करता था
जैसे सरोकार ही न हो
उन चीखों से
लग रहे हो उन्हें वे सब पागल से
सारी की सारी भीड़
हजारों- लाखों की.......

..........

एक पल के लिए
उस आईने की
निष्पक्षता पर शक होने लगा
फिर सच्चाई की तह तक
जाने का खुद ही प्रयास करने लगा
अचानक निकल गए शब्द मुंह से
यह आईना झूठा है
यह सब झूठ दिखाता है
घटना का दूसरा पहलू भी होता है
लेकिन उसे यह छुपा लेता है
नहीं नहीं मैं नहीं देखूंगा
इस आईने को
अभी बन्द कर लूंगा
मैं अपनी दोनों आंखों को
यह कह कर आंखें बंद करने लगा
पर यह क्या
आंखें तो बन्द हो ही नहीं रही थीं
पलकें वहीं की वहीं थी
हिला ही नहीं पा रहा था
मैं पलकों को
समझ नहीं पा रहा था
इस छल को
यह कैसी समस्या है
कहाँ आकर फंस गया हूँ
पर आया कहाँ
मैं तो यहाँ लाया गया हूँ
खींच कर ,बांध के, घसीट के
यहाँ कुछ भी नहीं होता मेरी मर्जी से
खिलौना है, तिनका है
पर हाथ का सूखा हुआ
मेरा वजूद.......
...........

उस आईने को देखना
अंधेरे में मजबूरी थी
ओर कुछ देख ही नहीं सकता था
देखना ही पड़ता था
जो दृश्य उसमें चलता था

मेरी दो आंखें
गोल बांध दी हो जैसे
अनन्त ऊंचाई की रस्सी से
पेंडुलम की तरह
दोलन कर रही हों लगातार
उस आईने के सामने
एक निश्चित दिशा में
पथ पूर्व निर्धारित
पर हाथों से निर्मित
एक यन्त्र एक खिलौना
जो बनाया गया था
अपनी ही सन्तुष्टि के लिये
अपने मनोनुकूल
हाथों की उंगलियों को
पलकों तक ले जाना चाहा
लेकिन उसमें भी असफल रहा

बेबस नारे लगाते लोगों की तरह
मेरी आँख भी डटी रही
उन दृश्यों को देखने के लिये
जो रुचिकर न थे मेरे लिए
दृश्य में एक व्यक्ति दिखाई देता है
उम्र यही कोई पैंतीस- चालीस
का लगता है
वह बहुत उत्सुक दिखाई दे रहा है.....


एकदम जेंटलमैन
सफेद रंग की कमीज
ब्रांडेड पैंट
बातों से भी झलक रही थी तमीज
काले रंग की बेल्ट कमर पर
लगभग साढ़े पांच फुट का कद
आकर्षक चेहरा उजला -सा
काली मूछ नुकीली सी
जच रही थी उस पर बेहद
पैरों में काले रंग के जूते
जैसे होते हैं सैनिकों के
या कारखानों के कामगारों के
सेफ़्टी के लिए
शायद वह भी करता था काम
किसी विभाग सरकारी के लिए

ओ हाँ वह दिख रहा है
अपने दोस्तों के साथ
तीन चार दिखाई दे रहे हैं
कर रहे हैं हँसी मजाक में बात
तीन चार नहीं साफ चार नजर आ रहे हैं
चारों लग रहे हैं एक ही उम्र के
बस उनमें एक गंजा ज्यादा है
और दूसरा वजन में भारी है
तीसरे की कुछ बढ़ी दाढ़ी है
पर बाल कोई भी सफेद नहीं है
इतने में आंखों का पेंडुलम
वापिस दिशा में जाता है
सारा दृश्य अब दूर से नजर आता है.....


.........

हर जोर जुर्म की टक्कर में
संघर्ष हमारा नारा है
अपना हक लेके रहेंगें
साड़ा एका जिंदाबाद
फिर सुनाई दी
उस आईने में आवाज
लेकिन कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं देता था
विचलित सी तरंगों में अस्पष्ट सा
एक विशाल कामगारों का
जनसमूह लगता था
शायद उनका हक छीना जा रहा था
शायद यह रोजी रोटी का मसला था
लेकिन स्पष्ट कुछ भी न था

उनकी आवाजें कानों को
सुन्न कर के निकल गई
लेकिन दृश्य फिर बदल गया
और सामने वही चार पांच
दोस्तों का झुंड आ गया
उसी अंदाज में  वे बातें कर रहे थे
शायद अपनी जिंदगी से
बहुत खुश थे
पीठ पर बैकपैक लिए थे सब वे
शायद कहीं जा रहे थे

सामने कुछ ओर नजर आने लगा है
अब आईना कुछ ओर साफ 
दिखाने लगा है
देख पा रहा हूँ मैं सामने
रेलवे स्टेशन है
लंबी कतार में खड़े मालगाड़ी के वैगन हैं

स्टेशन के प्रवेश द्वार पर
सामने तीन चार सीढियां
सामने आगे
तोरण द्वार सा खड़ा मेटल डिटेक्टर
उसके बीच से ही गुजरना होता था सबको
कोई भी नहीं जा सकता था बचकर
तभी किसी गाड़ी के आने की
अनाउंसमेंट होने लगी
सुस्त कदम अब ओर तेज हो गए थे
वे दोस्त भी ओवरब्रिज की ओर बढ़े
अनाउंसमेंट पर कान लगाए
आंखों को सीढ़ियों पर गढ़ाये
चढ़ रहे थे  ओवरब्रिज पर
सफलता की सीढ़ियों की तरह
स्वतः कदम बढ़ रहे थे
गंतव्य प्लेटफॉर्म की तरफ
शायद प्लेटफॉर्म नम्बर तीन था
अभी भी वहां तक पहुंचने के लिए
पन्द्रह बीस सीढ़ियां शेष उतरनी थी
परस्पर वार्तालाप डूब चुकी थी
अथाह शोर के समुन्दर में
अब लहर की सी आवाज सुनाई देती थी
वो भी दव जाती थी गाड़ी के गुजरने से
हजारों की भीड़ बस चली जा रही थी
कुछ सामान लिए कुछ खाली
बस चलने का धर्म निभा रहा था हर कोई
कुछ कदमों से, कुछ घुटनों से
कुछ रेंग कर धर्म निभा रहे थे प्रकृति का
जंगम बनकर , चंचल रखकर खुद को
इस प्रकृति को
नारंगी रंग के
सीमेंट की पट्टियों से बने
बैंच पर जाकर वे बैठ गए
जो अभी एक गाड़ी के जाने से खाली हुए थे।




पांच छः मिन्ट ही हुए थे अभी
कि गाड़ी सामने नजर आने लगी
दोस्त सब उठकर
सामान्य श्रेणी की तरफ भागे
जो डिब्बा लगा था गाड़ी में सबसे आगे
थोड़ी ही देर में गाड़ी चल पड़ी
क्योंकि 
स्कूल की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थी
इसलिए सबको 
आराम से सीट मिल गई
यूँ तो सामान्य श्रेणी में ऊपर की सीट
सामान रखने के लिए होती है
फिर भी जनता उस पर 
आराम से सोती है
ऊपर की सीट पर 
एक अजीब सा व्यक्ति सोया था
आँखों से तो जागा ही था
कह सकते हैं वह लेटा था
बड़े बड़े बाल थे उसके
उलझे हुए
और बुद्धि से भी वह
उलझा हुआ लगता था
थोड़ी -थोड़ी देर बाद 
वह कुछ बड़बड़ा रहा था
खुद से ही बातें कर रहा था
उसको अनदेखा कर के
वे दोस्त अपनी ही बातों में व्यस्त थे
भाड़ में जाए दुनियादारी
वन्दे अपने में ही मस्त थे।


चर्चा हो रही थी उस विषय पर
जो मध्यम वर्ग में आम होती है
रोजी - रोटी के अलावा
उसका भी बोझ ढोती है
हर गली मोहल्ले में
छोटी - छोटी चाय की दुकानों में
बरगद के नीचे चबूतरे पर बैठे
गन्दे न हो जाएं ताश के पत्ते
बिछा देते हैं जमीन पर कुर्ता
उतार कर बनियान के ऊपर से
बीड़ी को सुलगता
चूने को मिलाकर तम्बाकू में
बड़े अभिनय से ताली बजाता
हर इंसान कुछ देर बाद
राजनीति का विश्लेषक बन जाता है
जब भी भारत में चुनाव का मौसम
नजदीक आता है।

अभी तीन महीने बाकि थे
चुनाव की तारीख भी अभी तय नहीं थी
लेकिन हर एक कि जुबान पर
अब केबल राजनीति थी
कौन दल श्रेष्ठ है
किसको जिताना है
किस - किस का होगा सूपड़ा साफ
किसको नेता बनाना है
जिसे अपने घर की खबर नहीं
रसोई में क्या है क्या नहीं
दाल, सब्जी, चावल, आटा
था वह भी राजनीति की बातें करता।

........ 


आमने -सामने बैठे दोस्त
थे लोकतंत्र की कर रहे बड़ाई
खुशनसीब थे वे सब
जो काम आ गई थी उनकी पढ़ाई
वोट जरूर देना चाहिए
अब चर्चा का विषय बन गया था
वोट न देने वालों को तो
एक ने देशद्रोही तक कह दिया था
इतने में सीट के ऊपर लेटा आदमी
जोर -जोर से हँसने लगा
बड़बड़ाते हुए कुछ
अस्पष्ट- सा वह कहने लगा
जब उसकी ओर देखा दोस्तों ने
तो उसका मुँह छत की तरफ था
अजीब सी मुद्रा थी उसकी
उन्हें लगा
शायद उसके दिमाग में फर्क था
फिर उसको अनदेखा कर वे
अपनी बात आगे बढ़ाने लगे
राष्ट्रवादी सोच से ओतप्रोत वे
अन्य देशों की कमियां गिनाने लगे
चाहे पासपोर्ट नहीं बनबाया था उन्होंने
फिर भी अद्भुत ज्ञान रखते थे
जैसे भारत में न हों वे
और उन देशों में रहते थे
सामाजिक ,आर्थिक सब समस्याएं उनकी
हल सहित सब मालूम थी उनको
अपने देश की तनिक बुराई
बिल्कुल भी न कबूल थी उनको

....... मिलाप सिंह भरमौरी