milap singh

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Monday, 3 June 2019

मकड़ी ओर झाड़ू

कुछ तो कारण रहते थे

जो बुजुर्ग हमसे कहते थे


शाम ढल चुकी है


ईधर आ जा


वक्त ठीक नहीं है यह


तू झाड़ू न लगा।

देखा जाल मकड़ी का घर में


रात को तो


उठा लिया मैंने भी


हाथ में झाड़ू को


सोचा


अभी इसको साफ कर देता हूँ


उठा के मकड़ी को


बाहर फैंक देता हूँ।

फिर अचानक वो बात


याद आ गई


गलत है ये सचमुच


वो थे बिल्कुल सही


कहाँ जाएगी मकड़ी यह रात को


बनाने में जाला


उसने भी की है मेहनत तो।

सुबह निकालूँगा बाहर तो


बना लेगी ओर कहीं घर ये


सिर्फ मकड़ी की ही बात नहीं है


ओर भी कई परजीवी निकलते 


होंगे बाहर झाड़ू से।

........ मिलाप सिंह भरमौरी

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