ढूँढ रहे थे इधर उधर
जन्नत तो यहीं बसी है
इससे सुंदर कुदरत की काया
शायद ओर कहीं नहीं है
यही तो है वादिए भरमौर
यही तो है वादिए भरमौर।।
------ मिलाप सिंह भरमौरी
ढूँढ रहे थे इधर उधर
जन्नत तो यहीं बसी है
इससे सुंदर कुदरत की काया
शायद ओर कहीं नहीं है
यही तो है वादिए भरमौर
यही तो है वादिए भरमौर।।
------ मिलाप सिंह भरमौरी
महसूस यूँ हुआ कुछ
आकर अपने गांव में
जैसे गोदी में भर लिया हो
प्यार से मां ने ।
इसकी मिट्टी के कण-कण से
मेरा रिश्ता गहरा है
सारा शरीर रोम- रोम
इससे ही तो बना है ।
फक्र होता है
इसकी आबोहवा से
जिससे मेरी जीव संरचना बनी है
रक्त दिया है मेरी रग- रग को इसने
और मुझको सांसे दी है ।
----- मिलाप सिंह भरमौरी
इस आग उगलती गर्मी से
कुछ दिन राहत पा आते हैं
लेकर के कुछ छुट्टियां
ठंडी भरमौर की वादियों में जा आते हैं
टेक आते हैं चौरासी में माथा
कुगती में कार्तिकेय के दर्शन पा आते हैं
बहुत प्रसिद्ध है मणिमहेश यात्रा
भोले के दर सिर झुका आते हैं
------ मिलाप सिंह भरमौरी
भीतर चला द्वंद्व
बाहर चले श्लोक।
इह लोक में फंसे हुए को
मिले कैसे परलोक।
जीना है तो अंदर की सुन ले
थोडा सा तू पगला बन ले।
देख के अपनी बर्बादी को भी
खींच के तू ताली ठोक।
---- मिलाप सिंह भरमौरी
जल जाने से अच्छा है
सड जाना ।
उससे भी अच्छा है
जंगली जानवरों का
निवाला बन जाना ।
किसी का तो पेट भरेगा
तृप्त हो जाएगा रूह तक ।
चाव से चवाएगा हड्डियाँ
अगले दो पैरों से पकडकर ।
चलो किसी के काम तो आएगा
यह मृत निश्चल शरीर ।
क्यों रहता है मानव तू
अंतकर्म के लिए अधीर ।
इक अदृश्य क्रिया के कारण
क्या क्या करता फिरता मानव ।
रख कल गिरवी इंसानियत को
बन जाता है पूरे का पूरा दानव ।
---- मिलाप सिंह भरमौरी
रोक रखा है मुझे
यह जाने नहीं देती
रोक रखा है मुझे
यह जाने नहीं देती ।
इस बारिश की जिद्द पे
किसका जोर चलता है ।
----- मिलाप सिंह भरमौरी
एक रुपये का सिक्का
उसने झट से जेब से निकाल कर
काउंटर पर रखा
और बडे मासूमियत से बोली
मैंने पैसे दे दिए हैं
आप रहने दो पापा
कितना मासूम होता है बचपन
उनहें क्या पता
कितनी होती है किस चीज की कीमत
एक रुपये के सिक्के से ही
वो खुद को अमीर समझ लेते हैं
कितने ही पवित्र , दिल से बच्चे होते हैं
------ मिलाप सिंह भरमौरी